शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

।। स्पन्दन ।।


















तुम !
मुझसे ज्यादा अकेले हो
जबकि
तुमसे अधिक मैं
इंतजार करती हूँ तुम्हारा ।

हम खोज रहे हैं
अपना-अपना समय
एक-दूसरे की धड़कनों की घड़ी में ।
अपने समय को
तुम्हारी गोद में
शिशु की तरह
किलकते हुए देखना चाहती हूँ ।
तुम्हारे ही अंश को
तुम्हारी ही आँखों के सामने
बढ़ते हुए
देखना चाहती हूँ ।

प्यार से अधिक
कोमल और रेशमी
कुछ नहीं बचा है
पृथ्वी पर
जीने के लिए ।

तुम्हारी हथेली की अनुपस्थिति में
छोटी लगती है धरती
जिन हथेलियों में
सकेल लिया करती थी
भरा-पूरा दिन
आत्मीय रातें
बची हैं उनमें
करुण बेचैनी
सपनों की सिहरनें
समुद्री मन की सरहदों का शोर ।

तुम्हारी आँखों में सोकर
आँखें देखती थीं
भविष्य के उन्मादक स्वप्न ।

तुम्हारे प्रणय-वक्ष में जीकर
अपने लिए सुनी हैं
समय की धड़कनें
जो हैं
सपनों की मृत्यु के विरुद्ध … ।

1 टिप्पणी:

  1. प्रेम से भरी हुई . जीवनसे धडकती हुई .. दिल को छूती हुई
    शब्दों ला कोमल अहसास. वाह जी वाह ..

    दिल से बधाई .
    विजय

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