रविवार, 4 अगस्त 2013

।। प्रणय-वक्ष ।।


















आँखें
एकनिष्ठ साधती हैं
अपने प्रणय-गर्भ में
तुम्हारी संवेदनाएँ

तुम्हारा प्रेम
प्रणय का ऋषि-कानन
अनुभूतियाँ रचती हैं
दुष्यंत और शकुंतला की तरह
प्रणय का नव-उत्सर्ग
गंदर्भ विवाह का आत्मिक संसर्ग

सच्चाई की धड़कनों से गूँजता
मनुष्यता की साँस से साँस खींचता
प्रेम के लिए अपने प्राण सौंपता
तुम्हारा प्रणय-वक्ष
स्वर्ग का एक कोना
जहाँ प्यार के लिए
सर्वस्व समर्पण
जहाँ बरसता है रंग
बरखा की तरह ।

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