शनिवार, 31 अगस्त 2013

।। सजल ।।


















उसने
अपनी माँ का
बचपन नहीं देखा
पर
बचपन से देखा है उसने
अपनी माँ को ।

जब से
समझने लगी है
अपने भीतर का सब कुछ
और
बाहर का थोड़ा-थोड़ा

लगता है
उसकी माँ की तरह की औरत
आकार लेने लगी है उसके भीतर

वैसे ही
गीली रहती हैं आँखें
वैसे ही
छुपाकर रोती है वह ।

दुःख से ललाये गालों को देख
किसी के टोकने पर तपाक बोल पड़ती है वह
प्रेम-सुख से बहुत सुंदर हो रही है वह
इसीलिए कपोल हैं लाल
और आँखें सजल ।

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