बुधवार, 10 दिसंबर 2014

।। उन्मुक्त व्यथा ।।

























तिथियों के
गुँजलक में
होता है तुम्हारा प्रवास
मेरा वियोग
पर उन्मुक्त है व्यथा
सूरज
नहीं जला पाता ताप
चाँद
नहीं पी पाता व्यथा-विष
सारी रात
सौरमंडल निरखता है आँसू
फिर भी
सितारे नहीं बाँट पाते हैं
व्यथा-सन्ताप

तिथियों के अंकों में
खुली होती है स्नेह-सींजी गोद
तुम्हारे आगमन-तिथि में
होती है तुम्हारी आँखें
         तुम्हारे अधर
मेरा सन्ताप लेने के लिए
अपना सन्ताप देने के लिए
फिर अगली प्रतीक्षा के लिए
तुम्हारे आगमन की
तिथि-सीप भीतर
होता है तुम्हारा
नेह-तप-मोती
जिसे
तपकर
लाते हो तुम
स्नेह-हार के लिए ।

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