रविवार, 14 दिसंबर 2014

।। कभी मेघबूँद ।।




















नदी के
द्धीप वक्ष पर
लहरें लिख जाती हैं
नदी की हृदयाकांक्षा
जैसे - मैं

सागर के
रेतीले तट पर
भँवरें लिख जाती हैं
सागर के स्वप्न भँवर
जैसे - तुम

पृथ्वी के
सूने वक्ष पर
कभी ओस
कभी मेघबूँद
लिख जाती है
तृषा-तृप्ति की
अनुपम गाथा
जैसे - मैं ।

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