।। प्रणय-पृथ्वी ।।




















प्यार
देह-भीतर
रचता है प्रणय-पृथ्वी

खुलती है देह
जैसे    डार

प्रेम की आँखें
खेलती हैं देह के पर्वतों से
हथेलियाँ बनाती हैं अक्षय प्रणय घरौंदे
देह की रेत से

प्रणय-उँगलियाँ
सिद्ध करती हैं प्रेम-हठयोग
साधना से सधता है ब्रह्मानंद-नाद

अपने अंतरंग के कैलाश-शिखर पर
साधनारत शिव की तरह समाधिस्त है
प्रणय
प्रिय की अन्तश्चेतना में प्रिय के लिए ।

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