शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

।। कुछ खामोश शब्द ।।

























लिफाफे की तरह
खोलती है शब्द
और शब्दों को
खोलती है मन की तरह

तुम्हारे ही शब्दों में
रखती है
मन-बसी तुम्हारी ही छवि
और उस रूप के अधरों पर
रखती है तुम्हारे शब्द-रूप
और सुनती है
शब्दों की छुपी
साँसों की आहटें
लहरों की तरह
एक-पर-एक
लगातार आती हैं जो

तुम्हारे ही शब्दों को
तुम्हारी ही आँखों में रखकर
पढ़ती है मौन मेरी आँखें
नम-मन-गंगा में नहाकर
भीग उठते हैं तुम्हारे ही शब्द
तुम्हारी अनुपस्थिति में
मेरी आँखों के सामने
आँखों के बीच
होते हैं कुछ खामोश शब्द
संबंधों की नई व्याख्या के लिए
शब्द-नक्षत्र-कोष

तुम्हारे शब्दों को
अपनी साँसों में सहेजकर
रखती हूँ मन-घर में
तुम्हारे अपने नाम-घर में
चुपचाप
मेरी साँसों की
हवाओं के अलावा
कोई मन-वसन्त नहीं सूँघता
साँसों के सपनों का वसन्त हैं 
तुम्हारे शब्द

नीली स्याही में है
तुम्हारे मन की गंगा
(नीलकंठी विष को
अपने शब्दों में घोलकर
गंगा-अमृत बनाया है)
तुम्हारे मन का आकाश ।

नीले शब्दों की नीली लहर में
डूबती हुई
स्पर्श कर आती हूँ
तुम्हारे प्रणय-उद्गम-प्राण
नीले शब्दों की
प्रशांत नीलिमा में से
बीन लाती हूँ कुछ
अपने लिए अर्थ-नक्षत्र
देह की दूरी को पाटते
देह से परे देह के लिए
तुम्हारे शब्द गढ़ते हैं
आत्मीयता का नया अर्थ-घर

तुम्हारे शब्दों में से
गढ़ती हूँ
प्रणयास्था की
अक्षय रूप छवि
तुम्हारे शब्द
मन-तंत्र के
अन्वेषी शब्द हैं
आत्मा का वेद रचते हैं ।

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