रविवार, 7 दिसंबर 2014

।। विश्रांति ।।



















सरसोईं सींजी साँझ में
देख रही थी
तुम्हारे हाथों में
जैसे कि हृदय की हथेली में
विश्राम से बैठी अपनी हथेली के चैन को
और रेखाओं की आँखों में उड़ते
रेशमी रंगीन भविष्यत् स्वप्न को

सन्नाटे की निःशब्द गूँज में
भविष्य के लिए मचलते आतुर शब्द
रचते हैं पूरा वाक्-संसार संबंधों की संवेदनाओं का

सारे भेद अस्तित्वहीन होकर
तिरोहित हो जाते हैं
अनपहचाने अजनबी शब्द
सहमते और सिसकते हैं ।
तुम्हारे स्पर्श के
आत्मीय मौन में
कि जैसे रंग-डूबी तूलिका ने
रेखाओं की लिपि में उकेरा हो  अबूझ कुछ

देहांश के एक कोने में उस क्षण
कोपल-सी कोमल हो आई थी अनुभूति
जल-सी तरल रिस आई थी संवेदना
काँच-सा पारदर्शी था स्पंदन
जिसमें प्रतिबिम्बित थी
तुम्हारी आत्मा …आत्मा का प्रेम
प्रेम का सर्वस्व समर्पण
जैसे भीतर के मरुस्थल में दबा पड़ा
कोई बीज
अपनी पहचान बनाता
अंकुरित हो आया हो
स्नेह-स्पर्श से

सार्थक हो आई काया ने
एक नाम दिया था उस क्षण
हथेलियों में
उपला आई गहरी आत्मीय अनाम आस्था को
जैसे गाँव की अबोध स्त्री
देववृक्ष तले
रख सुचिक्कण पथराया खंड
अभिषेक कर
घोषित करती है
यह है शिव
          यह है मेरा भगवान ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें