सोमवार, 15 दिसंबर 2014

।। छूट गई है खिली हुई ऋतु ।।






















तुम्हारी आँखें
छूट गई हैं मेरी आँखों में
शब्द
मेरे मौन में

तुम्हारी हुई
साँसों के घर में
बसेरा कर रही हैं मेरी साँसें
होंठ
बने हैं मेरी चाहतों के संकल्प

तुम्हारे स्पर्श में
छूट गई है खिली हुई ऋतु
पनपा है जिससे
तुम्हारी अंतरभूमि में उपजा
प्रणय-वृक्ष का अद्भुत बीज
मन-पड़ाव का आधार
एकांत का सखा-सहचर

स्मृतियों में बसी-रची
छूती हुई तुम्हारी परछाईं
हर क्षण छूती-पकड़ती है
पूर्णिमा की चाँदनी की तरह
फूलों की सुगंध की तरह
अलाव के ताप की तरह
तुम्हारा मन-स्वाद
छूट गया है मेरे आह्लाद कक्ष में
महुए की तरह
बची हुई पीताभा-सुगंध

सेमल की तरह
मुलायम होकर
मन ने रचा है
एक रेशमी-कोना
जिसमें लिखा है
सिर्फ तुम्हारा ही नाम
मेरे अपने
भविष्य के लिए
जो तुम्हारी हथेलियों में
बसी रेखाओं की तरह है

तुम्हारी हथेली की
रेखाओं की पगडंडी में
चलती हैं मेरी हथेली की रेखाएँ
वे एक हो जाती हैं
मन की तरह
खुशी के मौकों पर
मेरी हथेली खोजती है तुम्हारी हथेली
सुख की ताली के लिए
तर हथेली से
तरल होती है मेरी कातर, पसीजी हथेली
तुम्हारी अन्तःनीरा का
सतत प्रवाह पीता है मेरी प्यास

तुम्हारी तस्वीर में
बसी हँसी को
आँखों से बिनकर
और होंठों से चूमकर
सहेजती हूँ आँचल के कोर में
सुख के पारिजात
जो मेरे मन कुंड में
          भीग कर रचते हैं
          वसन्त का गीला-रंग
          तुम्हारे
          फाल्गुनी स्नान के लिए ।

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