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।। अपनापन ।।

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तुम्हारी मुट्ठी में है मेरी हथेलियाँ बर्लिन शहर के बीच ढही हुई दीवार के बाद जैसे साँझ की निलाई के साथ आँखों में समाता है तुम्हारा चेहरा द्धितीय विश्वयुद्ध बाद बसे हुए बर्लिन शहर की मुस्कुराहट की तरह मुझे चूमते हुए तुम्हारे अधर जैसे      सोखते हैं इतिहास और शब्दकोष से अर्थ की गहरी जड़ें जो सोयी हुई हैं विश्व युद्धों के इतिहास में ऋग्वेद की ऋचाओं में उपनिषद, पुराण और जातक कथाओं के अर्थ-सूत्रों में तुम्हारी मुट्ठी अक्सर छूट जाती है मेरी हथेली में विश्व के अनकहे संकटों को कहने के लिए जिन्हें गहरी रात गए आँखें पढ़ती हैं अपनी ही हथेली जिसमें तुम्हारी हथेली ने रचा है       अनरचा इतिहास तुम्हारी अनुपस्थिति को रोपती हूँ       शब्दों में तुम्हारे शब्द-बीजों से उगाती हूँ कविता की फसल प्रेम और आज के समय के लिए जो मेरे खालीपन को खलिहान में तब्दील कर सके ईश्वर-प्रतिमा पर चढ़ा हुआ पुष्प-हार कभी आ जाता है ज...

।। गदराई हुई नदी ।।

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तुम्हें अवतरित करती हूँ स्मृतियों की देह में जहाँ से प्रवेश करते हो तुम सर्वाङ्ग में सूर्य रश्मियाँ चिड़ियों की तरह गुनगुनाने लगती हैं      अनोखे शब्द कहीं भीतर से भीतर तक अनुभूति में उतरने लगती है उष्म तासीर पूरी संजीदगी के साथ भोर होने से पहले ही महसूस होते हैं    अजोरे के             'वे' कुछ शब्द             तुम्हारी हथेली सरीखे             अपने कंधे पर जो अपने स्पर्श में रचते हैं      विश्वास की भाषा             पीठ पर             नई इबारत             निर्मल        ...

दो कविताएँ

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।। एकात्म अवस्था ।। देह अंतरिक्ष के नक्षत्र हैं नयन और अधर सूर्य और चन्द देह में देह का लीन हो जाना और फिर विलीन विदेह प्रणय की एकात्म अवस्था ।। स्मृति-भवन ।। शब्दों से परे जाकर रचे जाते हैं     शब्द प्रेम में संप्रेषण की सरस भाषा प्रेम से परे जाकर रचती है प्रेम बह सकें जिसमें बाधाओं के पाषाण-खंड और बनाये 'घर' जो मृत्यु के बाद भी शेष रहे स्मृति-भवन स्वरूप ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

तीन कविताएँ

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।। ओढ़नी की रंगीनियाँ ।। वह पहनता है     मेरी आँखें अपने चश्में की तरह वह धारण करता है     मेरा समय अपनी घड़ी की तरह वह सुनता है        मेरे ही शब्द अपनी आवाज में वह देखता है         अपने सपनों में मेरी ओढ़नी की ही रंगीनियाँ प्रेम में ।। सुंदरतम रहस्य ।। ख़ुद को छोड़ दिया है      मुझमें जैसे      शब्दों में छूट जाता है     इतिहास सपनों की कोमलता आकार लेने लगती है      सच्चाई में अनुराग का रंग उतरने लगता है      देह में पलकों में लरजने लगते हैं ऋतुओं के सुंदरतम रहस्य आँखें       ओंठों की तरह मुस्कुराने लगती हैं सिर्फ़, तुम्हें सोचने भर से ।। विश्वास के पर्याय ।। बहुत चुपचाप व्याकुल चित्त में गूँथती है     शब्दों की परछाईं साँसों में   ...

दो कविताएँ

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।। सौंपने के लिए ।। मन के भोजपत्र पर अदृश्य भाषा में स्पर्श लिखता है प्रणय का अमिट महाकाव्य कि पूरी देह छूट जाती है प्रिय-देह में विदेह होने के लिए पृथ्वी का विलक्षण प्रेम उमड़ आता है भीतर-ही-भीतर तुम्हारे होने पर कि सृष्टि का संपूर्ण अमूर्त सौंदर्य मूर्त हो उठता है हृदय की अँजुली में तुम्हें सौंपने के लिए ।। नदी की गहराई ।। अपनी स्मृतियों में तुम्हारे प्रतिबिम्ब के उझकते ही मैं नदी हो जाती हूँ प्रवाहित होने लगता है मुझमें जीवन तुम्हारी बाँहों के दोनों तटों के बीच मैं उठने लगती हूँ अपनी देह की सतह से नदी की गहराई की तरह ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

तीन छोटी कविताएँ

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।। सूत्र ।। प्रेम में हम जनमते हैं      जीवन और जीवन में हम जानते हैं अथाह अछोर अनंत-प्रेम ।। देह की पृथ्वी में ।। वह रचाती है      ह्रदय में प्रेम का अथाह महासागर अनाम और अलौकिक पृथ्वी के महासागरों से इतर मन की देह की पृथ्वी का महासागर ।। अनश्वर ।। प्रिय का हर शब्द प्रेम की वंशावली है देह अनश्वर है जीवित रहती है    आत्मा की देह में    देह प्रेम की तरह ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से) 

।। ध्वनि-गुंजन ।।

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अनन्य अनुराग में उन्मत्त अविचल थिरकती उपासना के कानन में करती है     उपवास साँसों से जपते हुए आँसुओं का चढ़ाती है     अर्ध्य ताप में तपकर होती है सजल     उजल ऐसे में निर्मल शब्द देह में पहुँच कर घुल जाते हैं      रक्त में बन जाते हैं      देह की नेह पहचान विदेह हुई देह में होती है     मात्र प्रणय देह बहुत चुपचाप व्याकुल चित्त में गूँथती है    शब्दों की परछाईं साँसों में सिहरन धड़कनों में ध्वनि-स्पंदन सब पर्याय हैं     प्रेम में                       सिद्ध साधना के                       मूल मंत्र ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। कौंध-गूँज ।।

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अंतस में चट्टान हो चुकी समय की पर्तें चटकती रहती हैं      जब-तब वजूद के कुछ शब्द अधरों पर लेते हैं      अपना आकार वर्षों बाद देह ने ध्वनित होते सुना    स्वयं को    स्वयं में आँखें पहचान सकीं अपने आँसुओं का नमक और पानी अधरों में हुई     बाँसुरी-सी सुगंधित सिहरन और पकी फसल की तरह हम दोनों ने लिया        एक-दूसरे का नाम तैयार की निज की हथेलियाँ हथेलियों को भरने के लिए चित्त की गंध उतरने लगी थी चेतना में मन के बीजण लौट आए    फिर से भीतर से बाहर तक तुम्हारी आकांक्षाओं की अनथकी आहटें तुम्हारे धैर्य के कुछ अनिवार्य शब्द प्रार्थना से संयुक्त हो गूँजते हैं       आत्मा में हृदय की मंजुषा में सुरक्षित स्पर्श की हथेलियों का स्पंदन अनुभूतियों के नए रेखा-चित्र आकुल धड़कनों की धुन में गाते हैं       नई लय जो बजते ही रहते हैं निरंतर ...

।। प्रिय की हथेली ।।

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समय की धार उतारती हैं उँगलियों से नाखून और याद आती है तुम्हारी हथेली की पृथ्वी जो मेरे कटे हुए नाखूनों को भी अपनी मुट्ठी की मंजूषा में सहेज रखना चाहती थी तुम्हारी हथेली की अनुपस्थिति में पृथ्वी छोटी लगती है जहाँ मेरे टूटे नाखून को रखने की जगह नहीं बची न ओंठों के शब्द और न आँखों का प्यार जिन हथेलियों में सकेल लिया करती थी भरा-पूरा दिन एकांत रातें बची हैं      उनमें करुण-बेचैनी सपनों की सिहरनें समुद्री मन की सरहदों का शोर तुम्हारी आँखों में सोकर आँखें देखती थीं भविष्य के उन्मादक स्वप्न तुम्हारे वक्ष में सिमटकर अपने लिए सुनी है समय की धड़कनें जो हैं सपनों की मृत्यु के विरुद्ध ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। प्रेम का पर्याय ।।

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नदी जानती है चाँद का सुख जब सारी रात चाँद खेलता है उसके वक्ष से कोख तक कि नदी की मछलियों को बनाता है रुपहला चाँद और नदी के अभिसार का अभिलेख हैं रुपहली मछलियाँ कि वे नदी की देह में खोजती हैं     चाँद को जो घुल गया है प्रेम का पर्याय बनकर जैसे तुम मुझमें नदी के बहाव में है नदी के प्यार की धुन ध्वनि से शब्द बनाने के लिए चाँदनी बनती है चाँद की दूतिका चाँद सीखता है नदी से प्रेम की भाषा चाँदनी नदी में घुलकर रुपहली स्याही होकर तरंगों में लिखती है प्यार का भाष्य तुम्हारी साँसों से खींचती हूँ प्रेम की प्राणशक्ति अपने शब्दों की चेतना के लिए कि वे जब खुले और खोलें अपना मौन तो रचें  प्रेम की अमिट प्राकृतिक भाषा ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। सार्थक होने के लिए ।।

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तुम्हारे शब्द छूते हैं       पूरा दिवस आकार लेने लगता है     समय सार्थक होने के लिए कुँवारी आत्मा प्रणय के वसंत में लेती है    जन्म पुनर्जन्म प्रस्फुटित होता है भीतर से बाहर तक प्रणय लहरें छू कर चली जाती हैं और महसूस होती है      पूरी नदी वर्षों तलक बिल्कुल वैसे ही      जैसे आँखें नदी देखकर डुबकियाँ लगा लेती हैं      नदी में और जी लेती हैं प्रणय का कुँवारा आनंद-सुख ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। पक्ष में ।।

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मैं तुम्हारी तरह हूँ तुममें तुम्हारे वक्ष के कैनवास को भरती हूँ    अपने रंगों से तुम्हारी लिखावट में है मेरी तासीर की नमी स्मृतियों में सुनायी देती है    तुम्हारी आवाज़ धड़कनों की स्वर लहरी तुम्हारी आवाज़ तुम्हारी लिखावट तुम्हारे शब्द जो किसी भी धर्म ग्रंथ से नहीं हैं फिर भी आशीषते हैं    हर पल प्रणय को प्रकृति के पक्ष में पृथ्वी के लिए ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। तप रही आहुति ।।

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तुम्हारी हृदय अँजलि में मेरी हथेलियाँ जैसे यज्ञ-वेदिका में तप रही आहुति पुण्य के लिए तुम्हारी आँखों में प्रेम की निर्मल गंगा आकाशी निलाई के साथ समाता है चेहरा मुझे चूमता हुआ तुम्हारी आँखें मुझे पढ़ती हैं प्रेम की पहली पुस्तक की तरह शब्दों में बैठी हैं       अर्थ की गहरी जड़ें ऋग्वेद और पुराणों के अर्थसूत्र खोजती हूँ तुम्हारे शब्दों में तुम्हारी मुट्ठी में हर बार मेरी आँखें रख देती हैं    कुछ आँसू अनकही चिंताओं की गीली तासीर तुम्हारे वियोग में जनमते हैं    अक्षय प्रणय शब्द-बीज जो मेरे ख़ालीपन को खलिहान में बदलते हैं भगवान की प्रतिमा पर चढ़ा मेरा शब्द-पुष्प चरम सौभाग्य बनकर आता है     मेरी हथेली में तुम्हारी हृदय अँजलि के लिए ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। साक्षात्कार ।।

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शब्दों के पास होती है, आत्म चेतना चेतना शब्दों की आत्मा है स्पर्श करती है     सचेतनता के साथ सजग आत्मा को खोल देती है   देह-बंध तोड़ देती है   मोह-व्यामोह शब्द मुक्त करा लाते हैं    आत्मा को देह से कि आत्मा सुन सके आत्मा को आत्मा देख सके आत्मा को आत्मा स्पर्श कर सके आत्मा को शब्दों से और लीन हो सके    आत्मा में मुक्ति के लिए ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। लय-विलय ।।

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प्रेम में साँसें समझ पाती हैं साँसों की भाषा जो हथेलियों से आँखों तक एक हैं मन-देह के बीच अपनी लिपि में अपने लय में अपने शब्दों में अपने अर्थ में लय होती है विलय एकांत में राग की सुगंध और सुगंध का अंगराग लिप जाता है मन वसुधा में प्रणय चाहता है अपनी देह-गेह में प्रिय का हस्ताक्षर संवेदना की जड़ें पसरती जाती हैं    भीतर ही भीतर कि देह-माटी पृथ्वी के समानांतर अपना वसंत जीने लगती है प्रणयाग्नि से तपी देह हो जाती है स्वर्ण-कलश अमृत से पूर्ण प्रणय देह के ईश्वरीय चौखट पर समर्पित करता है     अपना सर्वस्व और विलीन होता है पंच तत्वों में ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

तीन कविताएँ

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।। भिगोने के लिए ।। स्मृतियों में आवाज़ नहीं होती है सिर्फ़ गूँज होती है मन-समुद्र के आवेग की संबंधों में रोशनी नहीं होती है सिर्फ़ उत्ताप होता है प्रणयाग्नि के प्रज्वलन का प्रेम में बरखा नहीं होती है सिर्फ़ बरसात होती है सर्वस्व भिगोने के लिए ।। विमुक्त होने के लिए ।। घुल गई है तुम्हारी ध्वनि शब्दों को आत्मसात कर लिया है चेतना ने        आत्मीय होकर साँसों ... में साँस लेती हैं    तुम्हारी ही आत्मा की ध्वनियाँ तरंगित अनन्य अनुराग छेड़ता है मिलकर     विलक्षण तान लय में जिसके विलय हो जाती है       देह ।। प्राणवान ।। शब्द छूते हैं    देह और देह जीती है     शब्द प्रेम में प्राणवान होती है ऐसे ही देह और ऐसे ही शब्द ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। शब्द-स्पर्श ।।

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शायद हवाओं की साँस ठहर जाती है क्षण भर के लिए जब सितारे लिखते हैं    नई तारीख़ अनुभूति-पट पर प्रथम-प्रणय का राग सूरज हर सुबह नई तारीख़ में झरता है अपनी धूप से जैसे  प्रेम पूरता है   हृदय के अक्षय-स्पंदन-कोष को जैसे   पर्वत जनमते हैं   अपनी स्नेह सरिताएँ शब्दों की शहदीली सुनहरी दीप्तिमान छुअन को जानते हैं     ओंठ जैसे    कवि के अधर पहचानते हैं      अपनी कविता के शब्द वैसे ही     कविता के ओंठ अनुभव करते हैं      कवि के अधर शब्दों की तरह शब्दों में प्रेम की तरह ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

तीन छोटी कविताएँ

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।। सिद्धी ।। प्रेम आत्मा का राग है प्रिय साधता है उसे देह के वाद्ययंत्र में प्रणय-सिद्धियों के निमित्त ।। दुर्गम देह ।। दैहिक महाद्धीपी दूरियों के बावजूद हार्दिक लहरें स्पर्श कर आती हैं     चित्त-तट-बंध और तब मुक्त हो जाती है देह देह-सीमा के दुर्गम बंधनों से ।। रूपांतरण ।। शब्दों में लीन ध्वनियाँ अर्थ में विलीन हो जाती हैं अर्द्धांगिनी की तरह जैसे मैं तुममें ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। ऋतुओं की हवाएँ ।।

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सुनती हूँ सुनकर छूती हूँ      तुम्हें स्वप्न स्वर्गिक वाद्ययंत्र बनकर गूँजते हैं     बहुत भीतर रचते हैं      संगीत का अंतरिक्ष तुम्हारे ओंठों से छूटे हुए शब्दों को       बचाकर सुना है तुम्हें तुमसे ही      तुम्हें छुपाकर गुना है तुम्हें एकांतिक मौन-विलाप सुदूर होकर भी अपनी धड़कनों के भीतर महसूस किया है      उसे जैसे नदी जीती है     अपने भीतर पूर्णिमा का चाँद दीपित सूर्य झिलमिलाते सितारे और चुपचाप पीती है ऋतुओं की हवाएँ अपनी तृप्ति के लिए ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। पोर-पोर में ।।

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चित्त चुपचाप ही स्मृति-पृष्ठों पर लिखता है     अभिलेख मौन ही       स्पंदन                 धड़कन                 बँधाव और           रचाव की तिथियाँ चुपचाप भोगता है     प्रेम प्रेम की आँखों का प्रतिबिम्ब अपनी आँखों में मुस्कुराहट का सुख अधरों में स्पर्श का अमृत अपनी हथेलियों में और प्रिय का प्रियतम अहसास पोर-पोर में कि जैसे आत्म-सुख से आह्लादित हो देहात्मा भी ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)