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।। चाँद का आत्म-सुख ।।

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सुनीलाकाश वक्ष पर लटकती हुई घड़ी है चाँद मिनट-दर-मिनट अंतरिक्ष से समेटता-बटोरता समय उलीचता है धरती पर और बदलता है तारीखें दिन-दिवस-माह लिखा जाता है जिसमें जन्म और मृत्यु का हिसाब सत्ता और शासन का इतिहास गुलामी का दर्द दवा बन जाने के लिए चाँद करता है खामोश बगावत चाँदनी बनकर पहुँचता है जंगल-दर-जंगल दासता से निचुड़े हुए लोग बुश नीग्रो अमर इंडियन ब्रिटिश इंडियन खून को पसीना की तरह बहाए हुए लोग छिपे हैं दक्षिण अमेरिका के सूरीनाम, गयाना और ब्राजीली जंगलों में जंगल-जीवी नागरीय संस्कृति के अनागरिक सुसंस्कृत सभ्यता से डरती हैं प्रकृतिजीवी वनीली जातियाँ चाँद जंगली जातियों का उत्सवी राजा है पूर्णिमा की रात चाँद के राजस्व में जंगली जातियाँ जीती हैं आनन्दोत्सव बेधड़क जिनका इतिहास लिखता है चाँद पृथ्वी की तथाकथित आधुनिक मानवीय सभ्यताओं के नाम चाँद पारिजाती कल्पवृक्ष रूपाभी रश्मियाँ चन्द्र कुसुम नवप्रियाओं के केशों में पुष्प-गजरा धरती के सौंदर्य के माथे की ...

।। प्रवासी शब्द ।।

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सूरीनाम की धरती से चाँद के वक्ष पर आँखों ने लिखी है चिट्ठी प्रतीक्षा में चाँद के ओठों पर रखा है अपने अधरों का स्नेह-अमृत तुम्हारे लिए चाँद की आँखों को सौपें हैं वासंती स्वप्न तुम्हारी सूनी आँखों को भरने-पूरने के लिए ह्रदय से निचुड़कर आते हैं शब्द शहद की तरह शब्द शहद रचते हैं प्रणय का सुगन्धित संवाद प्रणय प्रिय का मधु पुष्प है राग अनुरंजित पराग तुम्हारे शब्दों में ह्रदय की अनुभूतियों की चमक है और प्रणय की अन्तःसलिला का शीतल अमृत-स्पर्श नक्षत्रों की तरह निहारती हूँ तुम्हारे शब्द मेरे लिए वे ही हैं सप्तर्षि वे ही हैं ध्रुवतारा शब्दों के मौन में होती है आत्मा की जिजीविषा अव्यक्त पर व्यक्त तुम्हारे शब्द इसीलिए सीते हैं धागे की तरह मेरा फटा हुआ समय ।

सूरीनाम देश के भारतवंशियों के संघर्ष की 140 वीं वर्षगाँठ

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सूरीनाम देश के भारतवंशी इस देश में अपनी पीढ़ियों के संघर्ष की आज 140 वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं । एक संवेदनशील व्यक्ति और एक रचनाकार के रूप में पुष्पिता अवस्थी ने सूरीनाम के आर्थिक-सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश को तथा उस परिवेश में भारतीयों की सक्रिय भागीदारी, संलग्नता और योगदान को देखने/समझने का महती प्रयास किया है । अपने इस प्रयास को पुष्पिता ने अपनी विभिन्न रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त भी किया है । सूरीनाम से संबंधित उनकी रचनाओं के ढेर में से हम यहाँ उनकी एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं, जो उनके कविता संग्रह 'ईश्वराशीष' में प्रकाशित हुई है । ।। स्मृतियों का नरम सुख ।। सूरीनाम नदी-तट से गंगा-तट के लिए चिट्ठी लिखने से पहले सादे कागज को पारामारिबो की धूपीली-धूपीली धारदार आँच में सेंककर और अधिक उजला किया रात की स्याह हथेलियों के अंधे छापे से बचाकर कोरे कागज को चाँद की तरल चाँदनी से भिगोकर एकसार शब्द लिखे बिना अक्षरों के अनुभूत करने वाली अनुभूतियों की भाषा लिखी सादे कागज को मन की चंचल स्मृतियों का नरम सुख पिलाया सूरीनाम की वासंती रंग-गं...