पुष्पिता अवस्थी की कविताएँ उस भाव-संसार और उन भाव-दशाओं का ज्ञापन-उद्घाटन हैं जिनके बिना मनुष्य-चित्त के भीतरी सौंदर्य को परख पाना संभव नहीं है
'शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएँ' , 'अक्षत' और 'ईश्वराशीष' के बाद 'ह्रदय की हथेली' से पुष्पिता ने प्रणय, प्रतीक्षा, विरह, आतुरता, समर्पण और आराधना की लौकिक अनुभूतियों को लोकेषणा के सँकरे दायरे से बाहर निकाल कर जैसे एक आध्यात्मिक सिहरन में बदल दिया है । 'आँसू दुनिया के लिए आँख का पानी है/ लेकिन तुम्हारे लिए दुःख की आग है' कहते हुए कवयित्री ने प्रबंधन-पटु समय में प्रेम की एक सरल रेखा खींचनी चाही है । उसके यहाँ 'प्रेम के रूपक' नहीं हैं, प्रणय का पिघलता ताप है, आँखों की चौखट में विश्वास की अल्पना है, अन-जी आकांक्षाओं की प्यास है, प्रेम का धन-धान्य है, स्मृति के कुठले में सँजोए अन्न की तरह अतीत का वैभव है । अचरज नहीं कि कवयित्री खुद यह कहती है - 'इन कविताओं की व्यंजना आकाश की तरह निस्सीम है और आकाश गंगा की तरह अछोर भी । इनके अंदर की यात्रा मन के रंगों-रचावों की यात्रा है, रस-कलश की छलकन है । सृजन के राग का आरोहण और कृत्रिमता के तिमिर का तिरोहण है ।' प्रेम के उद्दाम आदिम संगीत से होती - प्रेम का गान करने और उसका मान रखने वाले ...