।। ज़ाकिर हुसैन की तबला वादकी ।।
ज़ाकिर हुसैन जगाते हैं नाद की अद्भुत कला तबले पर ऊँगलियों से । ज़ाकिर जानते हैं अमूर्त भाव को ध्वनि में मूर्त करना । तबले पर नृत्य करती हैं ऊँगलियाँ सिद्धहस्त नृत्यांगनाओं की तरह । हथेली-कलश शीश पर लिए ज़ाकिर की ऊँगलियाँ तबला-मंच की नर्तकी हैं प्रस्तुत करती हैं मुद्राएँ भाव मुद्राएँ । ध्वनियों में एक अद्भुत निनाद । राग में बजती है लय लय में लरजती है धुन धुन में धुनी रमाते हैं और जगाते हैं संगीत सिद्ध राग । ज़ाकिर अपने तबला वादन में गढ़ते हैं तरंगों की नई कला कला का नूतन आधुनिकतावाद नवीन मिठास आत्म निनाद । दो गोलार्द्धों की पृथ्वी ने नाप लिया है ज़ाकिर की हथेली तले तीनों लोकों का रहस्य-सुख मुट्ठी में है उनकी आत्मीयता का सजल अनुराग । तबले के दोनों फलक बनते हैं निनाद-कुंड पिघलता है ध्वनि का हिमालय ज़ाकिर की साधना के ताप से । तांडवी शंकर के आशीष से रचते हैं वादन-कला थाप और मुद्राओं को जीती और जगाती हुई गूँजती है निनाद-कला अवतरित होता है जीवनदायी संग...