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।। ओठों पर शंख ।।

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काग़ज़ पर शब्द जैसे ओठों पर शंख । मेरा मन तुम्हारी स्मृतियों की जीवन्त पुस्तक । ईश्वर ने हम-दोनों में बचाया है प्रेम और हम-दोनों ने प्रेम में ईश्वर ...।

लय : विलय

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प्रेम में साँसें समझ पाती हैं साँसों की भाषा जो देह की सिहरन से लेकर कपोलों की लाली तक एक है । मन की देह के बीच अपनी लिपि में अपने लय में अपने शब्दों में अपने अर्थ में लय होगी विलय । एकांत में राग की सुगंध और सुगंध का अंगराग । अपनी गंगा में जीती हूँ तुम्हारी यमुना जैसे अपने कृष्ण में तुम मेरी राधा । प्रणय चाहता है अपनी देह-गेह में प्रिय का हस्ताक्षर संवेदना की जड़ें पसरती जाती हैं भीतर-ही-भीतर कि देह-माटी पृथ्वी के समानांतर अपना वसंत जीने लगती है । प्रणयाग्नि से तपी देह हो जाती है स्वर्ण-कलश अमृत से पूर्ण । प्रणय देह की ईश्वरीय चौखट पर समर्पित करता है अपना सर्वस्व जैसे विलीन होते हैं पंच तत्वों में पंच तत्व ...।

।। आत्मीय शब्द ।।

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ओठों को बोलने से पहले शब्द का अर्थ चाहिए । ऊँगलियों को स्पर्श से पहले आवेग की गति चाहिए । ह्रदय को धड़कने से पहले देह चाहिए । पाँव को चलने से पहले रास्ता चाहिए । रास्ते से पहले तक घर जैसी आत्मीय मंज़िल चाहिए । मंज़िल से पहले जीवन चाहिए । जीवन से पहले ज़िंदगी की जरूरत चाहिए । जरूरत से पहले जीवन की ज़िंदगी चाहिए । जैसे जीने के लिए प्यार का विश्वास और उसकी शक्ति चाहिए; जैसे बीज को पेड़ बनने से पहले धरती, सूरज और पानी चाहिए; वैसे ही अपने से पहले मुझे तुम चाहिए । तुम्हारे तुम से ही मेरा 'मैं' बनेगा तुममें जीने के लिए तुमसे जीने के लिए ।

।। मधु घर ।।

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तुम्हारे होने के बाद अपने भीतर सूँघ सकी खाली जमीन की रूँधी-कसक जहाँ उग आया है बसंत मह-मह आकाश और उड़ान की फड़फड़ाहट । तुम्हारे शब्दों ने मेरे भीतर खोला पारदर्शी निर्झर प्यास के विरुद्ध ...। तुम्हारे होने भर से जान सकी फूलों में कहाँ से आती है सुगंध कैसे आती है कोमलता धूप उन्हें कैसे तबदील करती है रंगमय मन कैसे बदल जाता है वृक्ष में तितली कहाँ से लेती है लुभावने रंग मधुमक्खी क्यों बनाती है शहद का घर साख में टाँगकर ...। तुम्हारी आँखों में खुद को देखने के बाद जाना नदी क्यों बहती रहती है रात-दिन बगैर रुके समय की तरह ...।

।। बादल-बूँदें ।।

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बादल-बूँदों की तरह तुम हो मुझमें इन्द्रधनुषी रंगों की तरह । मछलियाँ गाती हैं सूर्यागमन की अगवानी का गान जैसे - मैं तुम्हारा प्रणय । हवाएँ चुपचाप घूमती हैं इधर से उधर प्यार की सुगंध के लिए खोजती हैं तुम्हें ।

।। उद्घोष ।।

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साँसों की हवाओं में धीरे-धीरे रम गया है प्रेम का मौन जैसे प्रकृति जीती है सन्नाटा संगम तट पर हथेलियों ने चुनी हैं कुछ सीपियाँ और मन में तुम्हारी स्मृतियाँ प्रेम के नवोन्मेष के लिए । सूर्य स्पर्श करता है जैसे प्रपात कुंड झरना सरिता वैसे ही तुम हमें बहुत दूर से अंतरंग स्पर्श । चाँद जैसे स्पर्श करता है उष्ण पृथ्वी तपी नदी सुरम्य घाटी उन्नत वृक्ष-शिखर वैसे ही मैं तुम्हें समुद्र-पार से छूती हूँ तुम्हारे मन की धरती अदृश्य पर दृश्य । जैसे आत्मा स्पर्श करती है परमात्मा और परमात्मा थामे रहता है आत्मा दो परछाईं (जैसे अगल-बगल होकर) एक होती हैं वैसे ही तुम मुझमें मैं तुममें । प्रणय की साक्षी है प्राणाग्नि अधरों ने पलाश-पुष्प बन तिलक किया है प्रणय भाल पर मन-मृग की कस्तूरी जहाँ सुगन्धित है सांसों ने पढ़े हैं अभिमंत्रित सिद्ध आदिमंत्र ...।

।। मौन ध्वनि ।।

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सारी विध्वंसात्मक कोशिशों के बावजूद मेरे वक्ष का कोई शब्द बिगड़ नहीं पाएगा । अनुपस्थिति में भी धड़कनें सुनेंगी सही-सही शब्दों की सार्थक अनुगूँज बिना क्षितिज के दिवस होंगे न सुबह होगी न शाम होगी चिड़ियों की पुकार में घुलेंगे प्रेम के शब्द उठाएँगे तुम्हें तुम्हारे सर्वस्व के साथ सर्वस्व के लिए । चह-चह में गूँजेगी राग-भैरवी न ओस ... न आवाज ... लेकिन मेरा 'मौन' रहेगा प्रेम के साथ प्रेम की तरह चुप अंतहीन रिक्तता को भरने के लिए ।