।। आँखों के घर में ।।
रात भर आँसू लीपते रहते हैं आँखों का घर अँगूठा लगाता है ढांढस का तिलक हथेलियाँ आँकती हैं धैर्य के छापे जैसे आदिवासी घर-दीवारों पर होते हैं छापे और चित्रकथा उत्सव और मौन के संकेत चिन्ह सन्नाटे में सिसकियाँ गाती रहती हैं हिचकियों की टेक पर व्यथा की लोक धुनें । कार्तिक के चाँद से आँखें कहती रहती हैं मन के उलाहने । चाँद सुनता है ओठों के उपालम्भ चाँद के मन की आँखों में आँखें डाल आँखें सौंपती रहती हैं अकेलेपन के आँसू और दुःख की ऐंठन । अनजाने, अनचाहे मिलता है जो कुछ विध्वंस की तपन टूटन की टुकड़ियाँ सूखने की यंत्रणा सीलन और दरारें मीठी कड़ुआहट ...