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।। आँखों के घर में ।।

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रात भर आँसू लीपते रहते हैं आँखों का घर अँगूठा लगाता है ढांढस का तिलक हथेलियाँ आँकती हैं धैर्य के छापे जैसे आदिवासी घर-दीवारों पर होते हैं छापे और चित्रकथा उत्सव और मौन के संकेत चिन्ह सन्नाटे में सिसकियाँ गाती रहती हैं हिचकियों की टेक पर व्यथा की लोक धुनें । कार्तिक के चाँद से आँखें कहती रहती हैं मन के उलाहने । चाँद सुनता है ओठों के उपालम्भ चाँद के मन की आँखों में आँखें डाल आँखें सौंपती रहती हैं अकेलेपन के आँसू और दुःख की ऐंठन । अनजाने, अनचाहे मिलता है जो कुछ            विध्वंस की तपन            टूटन की टुकड़ियाँ            सूखने की यंत्रणा            सीलन और दरारें            मीठी कड़ुआहट         ...

।। नहीं पहचान पा रहा है कोई ।।

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आँखों में बैठी-बैठी दृष्टि की उँगलियाँ छूती हैं यूरोप की जादुई दुनिया शामिल है जिसमें आदमी                       औरत                       और उनका तथाकथित प्रेम भी दृष्टि-उँगलियाँ रहती हैं आँखों की मुट्ठियों के साँचे भीतर बहुत चुपचाप वे कुछ नहीं पकड़ना-छूना चाहतीं मन संगमरमर की तरह चिकनाकर पथरा गया है  नहीं पकड़ पाता कोई मन खेल खेलने के नाम पर भी मुस्कराना ओठों का व्यायाम भर ह्रदय की मुस्कराहट नहीं आँसू, बहने के बाद नहीं सूखते सूखे आँसू ही बहते हैं अब गीला दुःख भीतर ही भीतर गलाता रहता है चुपचाप सबकुछ चेहरे की मुस्कराहट आधुनिक सभ्यता की प्लास्टिक सर्जरी की तरह भीतर का कुछ भी नहीं आने देती है बाहर देह भर बची है सिर्फ मानव पहचान की खुद से खुद को नहीं पहचान पा रहा कोई लोग पहचानते हैं सिर्फ ...

।। पृथ्वी अनुभव ।।

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नदी को नदी की तरह सुनो सुनाई देगी नदी अपनी अंतरंग आवाज की तरह । चाँद को चाँद की तरह देखो दिखाई देगी चाँदनी अपनी आँख की तरह । धरती को धरती की तरह अनुभव करो महसूस होगी पृथ्वी अपनी तृप्ति की तरह । प्रकृति को प्रकृति की तरह स्पर्श करो तुममें उतर जायेगी प्रकृति प्रेम सुख की तरह ।

।। दस्तक ।।

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दरवाज़े बने होते हैं दस्तकों के लिए । दस्तक से तड़प उठते हैं किवाड़ के रोम-रोम । दरवाज़े सुनना जानते हैं दस्तक पर चुप रहते हैं गरीब के सपनों की तरह । दरवाज़े जानते हैं दस्तकों की भाषा । सुनवाई न होने पर दरवाज़े छोड़ देते हैं दीवारें और दीवारों के घर ।

।। सेंट लूशिया द्धीप ।।

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कैरीबियाई सागर का सौंदर्य प्रतिनिधि सेंट लूशिया द्धीप जिसने जने नोबेल पुरस्कार विजेता कवि डेरक वालकॉट और अर्थशास्त्री आकाश-अंग-वस्त्रम को देह पर ओढ़े हुए नीलिमा को जीता है अपने वक्षाकाश में सूर्य के स्वर्णिम स्वप्निल कशीदे काढ़ता है नित्य अपने अंगरखे में कैरीबियाई द्धीपों का जल-जीवन-जनक-सागर नील-मंजुषा-रत्ननिधि संपन्न मौन ही रहता है आतुर अपने विविधवर्णी असंख्य द्धीपों के प्रति रुपहली-रेतीली शैय्या पर सोये-जागे सागर के वक्ष भीतर जीती तैरती रंगीन मछलियाँ जल जन्नत की तितलियाँ रंगों का पनीला सौंदर्य आँखों से पीती सौंदर्यप्रेमी गोताखोरों से अभयजीती मछलियाँ खेलती हैं उनकी हथेलियों से और देह चूम हल्के से तैर जाती हैं लहरों में समुद्र का अंतरंग उनका जलाकाश तैरना ही उनकी उड़ान कैरीबियाई द्धीप देश रचते हैं अपने तरह की कैरब बीयर कि जैसे सेंट लूसिया द्धीप द्धीप से अधिक नशे और सौंदर्य की मधुशाला हो पर एक्बेरियम की मछलियाँ पिंजड़ों की चिड़ियाँ फड़फड़ाहट में जीती हैं जो अपनी उड़ान हम सब की तरह ।

।। आयक्स एरीना में ।।

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5 मई 2013 से पहले कभी नहीं, कोच फ्रान्क द बूर ने बजायी होंगी इतनी सीटियाँ शायद अपने जीवन में भी नहीं और लड़कियों के लिए तो कभी नहीं हालैंड देश के लिए फ्राई दाख़ स्वतंत्रता दिवस 5 मई जहाँ लोग आपस में कह रहे थे बीयर है स्वतंत्रता तो कोई कहता संगीत है फ्राई हाइड लेकिन आयक्स एरीना में फुटबॉल खिलाड़ी 5 मई को 5 गोल बनाकर आयक्स क्लब देश का फुटबॉल चैम्पियन होकर पाँचों उँगलियों की मुट्ठी तानकर कोच फ्रान्क द बूर के साथ 'एक' होकर घोषणा कर रहे थे कि फुटबॉल खेल है फ्राई हाइड चैम्पियनशिप है फ्राई हाइड सच्चेमन और सच्चेपन का खेल है फ्राई हाइड खिला खुश जीवन है फ्राई हाइड प्रेम है फ्राई हाइड कोच फ्रान्क द बूर ने 5 मई 2013 को आयक्स एरीना में अपने जुड़वाँ भाई रोनाल्ड के नवसिखवे खिलाड़ियों को वर्ष भर में किया दक्ष और बना दिया देश का फुटबॉल चैम्पियन खिलाड़ी जबकि अपने एरीना घर में ही ए जेड क्लब के कीपर एस्तबान को लाल कॉर्ड मिलने पर आग बबूला हो उठे थे कोच खेट यान फरबेक कूद पड़े थे अम्पायर और खिलाड़ियों के बीच खेल को अपने हाथ में लेकर खिलाड़ियों ...

।। मधुबन के लिए ।।

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बच्चे अपने खिलौनों में छोड़ जाते हैं अपना खेलना निश्छल शैशव कि खिलौने जीवंत और जानदार लगते हैं बच्चों की तरह । बच्चों के अर्थहीन बोलों में होता है जीवन का अर्थ ध्वनि-शोर में रचते हैं जीवन का भाष्य जिसे रचती है आत्मा । बच्चों की गतिहीन गति में होती है सब कुछ छू लेने की आतुरता उनके तलवों से धरती पर छूट जाती है उनके आवेग की गति कि उनके सामने न होने पर भी ये चलते हुए लिपट जाते हैं यहाँ-वहाँ से । बच्चों के पास होती है अपनी एक विशेष ऋतु जिसमें वे खिलते हैं, खेलते हैं और फलते हैं हम सबके मधुबन के लिए ।