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।। नीदरलैंड समुद्रतट ।।

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नार्थ-सी पुत्र नीदरलैंड ऋतु के ग्रीष्म होने पर सूर्य-बिंब में बन जाता है दर्पण स्वयं देखता है प्रतिबिंब अंतरिक्ष अपना सर्वांग । रेत की रेती में उतरता है सूरज बच्चों के तलवों में सूर्य-शक्ति भरने के लिए और शीश-भीतर अंतरिक्ष का कौतुहली ज्ञान । मछली की तरह सागर प्रिय जन मन की देह को सेंकता है सूर्य और प्रक्षालित करता है सागर पयोधरों को बनाता है स्वर्ण-कलश । वेद की ऋचाओं से बाहर ही सूर्य स्नान करता है नार्थ-सी के जल में । वेदों के ज्ञान से अज्ञान प्रकृति के नैसर्गिक प्रेमी पृथ्वी की शांति में जीते हैं आत्म-शांति । छूट रहे रिश्तों में खो रहा है अपनापन प्रणय अन्वेषी जन नई परिभाषाओं के साथ जन्म देना चाहते हैं नया प्रेम । रिश्तों से ऊबे हुए फिर भी रिश्तों के लिए प्यासे घर से थके हुए रेतीले घरौंदों के खेल में घर को जीते हुए लोग नीले आकाश तले बुझाते हैं अपनी प्यास और आँखों से पीते हैं अछोर समुद्र की गति का छोर ।

।। योरस ।।

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योरस अपनी अविवाहित माँ मरियम के चेहरे के पीछे छिपाए हैं अपने पिता अलेक्सेंडर का प्यार और प्यार करना चाहते हैं दुनिया को दुनिया की गोद में जाकर । योरस के चेहरे पर उतरे हैं अपनी माँ के नयन-नक्श जिसके भीतर से बोलता है पिता का विश्वास । योरस हँसते हैं रसीली हँसी अपनी छह दँतुलियों के भीतर दुनिया की खुशी के लिए कि धुआँई जग से थकी ऊबी आँखें सीखे जीना बच्चों की खुशी के लिए । दो वर्षीय योरस देखना चाहते हैं दोनों गोलार्द्धों को अपनी नन्हीं ललाई मुट्ठी में कि आणविक युद्ध की आग से अधिक ताकत है मुट्ठी की लालिमा में अपना बनाने के लिए । नीली आँखों में समेटे हैं अपनी मातृभूमि हालैंड की दीर्घजीवी शांति शांति-दूत कपोत का संदेश संस्पर्श करता है मौन । चलने में असमर्थ पर, बैठे ही बैठे घिसटकर पहुँच जाना चाहते हैं हर उस चाहत के पास जो चाहती है उन्हीं की तरह । योरस से आती है मानव-शिशु होने की अलौकिक सुगंध कि परफ्यूम्ड सुगंध के मिलते ही चिहुँककर पलट लेते हैं नाक मसलते नहीं भूल...

।। छोर से परे ।।

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                                समुद्र के निनाद में है बच्चों की ध्वनि तरंग प्रतिध्वनित लहरें जैसे कि उनके ही उठे हुए हाथ और बच्चों में होता है समुद्र का अछोर कोलाहल आकुल और व्याकुल माँ के आँचल के भी छोर से परे ।

।। अंतर्ध्वनि ।।

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औरत चुप रही दुनिया बोलती रही । ऐसे ही एक सदी बीत गई । औरत सुनती रही है दुनिया के खोखले और डरावने शब्द । बच्चे जिन्हें मुखौटा कहते हैं ।

।। इफोन ।।

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इफोन सबके लिए एक स्त्री का नाम है वह सिर्फ ख़ुशी का प्रतीक है । स्विट्जरलैंड, इटली, आस्ट्रिया की मिलन भूमि 'नाउदर्स' के एक होटल की स्वागत रमणी है मालिक के लिए आगंतुकों के लिए । उत्साहपूर्ण सेवातुर । 'प्लोनर' होटल मालिक तीन कन्याओं के पिता ने नहीं पहचाना इफोन के भीतर का बेटी मन । पल्लव-सी स्वयं फूलों-सा सजाकर रखती है खुद को पर तितली की तरह बैठ जाना चाहती है हर अतिथि के पर्यटकी मन पर । अपनी आँखों की खुशी में सोख लेना चाहती है वह अतिथियों की थकान । पक्षियों की तरह यायावरों के कंधों पर बैठकर घूम आना चाहती है देश-विदेश । संचार-युग में तस्वीर खिंचवाने में सहमती-सकुचती इफोन स्वयं अपनी माँ की एक सुंदरतम तस्वीर है होटल के फ्रेम में जड़ी हुई । भविष्य की प्रतीक्षा में जीती लेकिन, भविष्य से डरती अपनी हथेलियों को बंद रखती है अक्सर जब से उसने जाना है कि मुट्ठी में रहता है भविष्य । आस्ट्रिया के लिबास नाउदर्स गाँव की संस्कृति के प्रति उसके भीतर है खूबसू...

।। अपनों की याद में ।।

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(एक) विदेश-प्रवास में तपन और पाले में एकाकी पड़ा है मेरे मन का चबूतरा जैसे हवा में किसी स्मृति-घाव का गीला निशान । इच्छाओं के नाव-घर से ढूँढ़ती हैं बूढ़ी आँखें बीते कल उजले अतीत । प्रिय की स्मृति में अपनी ही अंजुलि में अपना चेहरा टिकाए कि मेरी हथेलियाँ उसकी ही हथेली हो बैठी हैं स्वदेशी इच्छाएँ आत्मसुख के लिए । (दो) बेआबरू मौसमों की तरह पड़े हैं सपने आँखों के कोने में एकाकी परदेश प्रवास में सूरज की सेंक में सुलगते हैं स्वप्न जिंदगी फिर भी रचती रहती है नए नए ख्वाब विदेशी मित्रों की तरह । विदेश में याद आती हैं सहमी हुई स्मृतियाँ चाँदनी से भी झरता रहता है अँधेरा पूर्णिमा की पूरी रात अकेले में 'उदास' शब्द के गहरे अर्थ की तरह । इच्छाएँ माँगती रहीं नए पत्ते जहाँ साँस ले सके इच्छाएँ और उनसे जन्म ले सकें अन्य नवीनतम इच्छाएँ । इच्छाओं के साँचे में समा जाती हैं जब भी इच्छाएँ जिंदगी हो जाती है जिंदगी के करीब जैसे कागज के आगोश में होती है कलम कुछ ...

।। हथियार ।।

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कविता को रचना है हथियार सारे हथियारों के विरुद्ध अपनी भाषा में । बिना युद्ध किए जीतने हैं सभी युद्ध आज की सभी भाषाओँ को । धर्म के भीतर बचाना है धर्म बिना ईश्वर के ।  सारे धर्मों से बाहर निकालना है धर्म को ईश्वर नहीं आदमी के पक्ष में कविता को अपनी भाषा में फिर वह कोई भी भाषा हो … ।