।। मन का ऋतुराज ।।
आकाश के नील पत्र पर धूप-स्याही से हवाओं ने 'वसंत' शब्द लिखा मेरे मन का ऋतुराज तुम्हारी घड़ी में अपना समय देखता है तुम्हारे शब्दों में अपने लिए संकल्प तुम्हारी नींद में अपने लिए स्वप्न तुम्हारे लिखे में से अपने लिए शब्द आत्मीय शब्द तुम मेरी कलाई में घड़ी की तरह बँधे हो तुम्हारी घड़ी में है मेरा चंचल दिन ठहरी-ठिठकी रात तुम्हारी घड़ी-सुइयों में प्रतीक्षारत है मेरा समय ।