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दो कविताएँ

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।। एकात्म अवस्था ।। देह अंतरिक्ष के नक्षत्र हैं नयन और अधर सूर्य और चन्द देह में देह का लीन हो जाना और फिर विलीन विदेह प्रणय की एकात्म अवस्था ।। स्मृति-भवन ।। शब्दों से परे जाकर रचे जाते हैं     शब्द प्रेम में संप्रेषण की सरस भाषा प्रेम से परे जाकर रचती है प्रेम बह सकें जिसमें बाधाओं के पाषाण-खंड और बनाये 'घर' जो मृत्यु के बाद भी शेष रहे स्मृति-भवन स्वरूप ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

तीन कविताएँ

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।। ओढ़नी की रंगीनियाँ ।। वह पहनता है     मेरी आँखें अपने चश्में की तरह वह धारण करता है     मेरा समय अपनी घड़ी की तरह वह सुनता है        मेरे ही शब्द अपनी आवाज में वह देखता है         अपने सपनों में मेरी ओढ़नी की ही रंगीनियाँ प्रेम में ।। सुंदरतम रहस्य ।। ख़ुद को छोड़ दिया है      मुझमें जैसे      शब्दों में छूट जाता है     इतिहास सपनों की कोमलता आकार लेने लगती है      सच्चाई में अनुराग का रंग उतरने लगता है      देह में पलकों में लरजने लगते हैं ऋतुओं के सुंदरतम रहस्य आँखें       ओंठों की तरह मुस्कुराने लगती हैं सिर्फ़, तुम्हें सोचने भर से ।। विश्वास के पर्याय ।। बहुत चुपचाप व्याकुल चित्त में गूँथती है     शब्दों की परछाईं साँसों में   ...

दो कविताएँ

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।। सौंपने के लिए ।। मन के भोजपत्र पर अदृश्य भाषा में स्पर्श लिखता है प्रणय का अमिट महाकाव्य कि पूरी देह छूट जाती है प्रिय-देह में विदेह होने के लिए पृथ्वी का विलक्षण प्रेम उमड़ आता है भीतर-ही-भीतर तुम्हारे होने पर कि सृष्टि का संपूर्ण अमूर्त सौंदर्य मूर्त हो उठता है हृदय की अँजुली में तुम्हें सौंपने के लिए ।। नदी की गहराई ।। अपनी स्मृतियों में तुम्हारे प्रतिबिम्ब के उझकते ही मैं नदी हो जाती हूँ प्रवाहित होने लगता है मुझमें जीवन तुम्हारी बाँहों के दोनों तटों के बीच मैं उठने लगती हूँ अपनी देह की सतह से नदी की गहराई की तरह ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

तीन छोटी कविताएँ

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।। सूत्र ।। प्रेम में हम जनमते हैं      जीवन और जीवन में हम जानते हैं अथाह अछोर अनंत-प्रेम ।। देह की पृथ्वी में ।। वह रचाती है      ह्रदय में प्रेम का अथाह महासागर अनाम और अलौकिक पृथ्वी के महासागरों से इतर मन की देह की पृथ्वी का महासागर ।। अनश्वर ।। प्रिय का हर शब्द प्रेम की वंशावली है देह अनश्वर है जीवित रहती है    आत्मा की देह में    देह प्रेम की तरह ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से) 

।। ध्वनि-गुंजन ।।

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अनन्य अनुराग में उन्मत्त अविचल थिरकती उपासना के कानन में करती है     उपवास साँसों से जपते हुए आँसुओं का चढ़ाती है     अर्ध्य ताप में तपकर होती है सजल     उजल ऐसे में निर्मल शब्द देह में पहुँच कर घुल जाते हैं      रक्त में बन जाते हैं      देह की नेह पहचान विदेह हुई देह में होती है     मात्र प्रणय देह बहुत चुपचाप व्याकुल चित्त में गूँथती है    शब्दों की परछाईं साँसों में सिहरन धड़कनों में ध्वनि-स्पंदन सब पर्याय हैं     प्रेम में                       सिद्ध साधना के                       मूल मंत्र ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। कौंध-गूँज ।।

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अंतस में चट्टान हो चुकी समय की पर्तें चटकती रहती हैं      जब-तब वजूद के कुछ शब्द अधरों पर लेते हैं      अपना आकार वर्षों बाद देह ने ध्वनित होते सुना    स्वयं को    स्वयं में आँखें पहचान सकीं अपने आँसुओं का नमक और पानी अधरों में हुई     बाँसुरी-सी सुगंधित सिहरन और पकी फसल की तरह हम दोनों ने लिया        एक-दूसरे का नाम तैयार की निज की हथेलियाँ हथेलियों को भरने के लिए चित्त की गंध उतरने लगी थी चेतना में मन के बीजण लौट आए    फिर से भीतर से बाहर तक तुम्हारी आकांक्षाओं की अनथकी आहटें तुम्हारे धैर्य के कुछ अनिवार्य शब्द प्रार्थना से संयुक्त हो गूँजते हैं       आत्मा में हृदय की मंजुषा में सुरक्षित स्पर्श की हथेलियों का स्पंदन अनुभूतियों के नए रेखा-चित्र आकुल धड़कनों की धुन में गाते हैं       नई लय जो बजते ही रहते हैं निरंतर ...

।। प्रिय की हथेली ।।

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समय की धार उतारती हैं उँगलियों से नाखून और याद आती है तुम्हारी हथेली की पृथ्वी जो मेरे कटे हुए नाखूनों को भी अपनी मुट्ठी की मंजूषा में सहेज रखना चाहती थी तुम्हारी हथेली की अनुपस्थिति में पृथ्वी छोटी लगती है जहाँ मेरे टूटे नाखून को रखने की जगह नहीं बची न ओंठों के शब्द और न आँखों का प्यार जिन हथेलियों में सकेल लिया करती थी भरा-पूरा दिन एकांत रातें बची हैं      उनमें करुण-बेचैनी सपनों की सिहरनें समुद्री मन की सरहदों का शोर तुम्हारी आँखों में सोकर आँखें देखती थीं भविष्य के उन्मादक स्वप्न तुम्हारे वक्ष में सिमटकर अपने लिए सुनी है समय की धड़कनें जो हैं सपनों की मृत्यु के विरुद्ध ('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)